Wednesday, December 5, 2007

साहु-समीर

प्रखर ग्रीष्म का विकट समय,
थी CSE की क्लास
सारे बच्चे अन्यमन्स्क से,
शिक्षक थे बिस्वास !

अग्रिम पन्क्ति के दो बच्चे
बना रहे थे नोट,
तभी अचानक पीछे कहीं,
हुआ तीव्र विस्फोट !

15 में से 12 बच्चे,
गिरे होके विक्षिप्त,
शेष में विशेष हुए
कविता करने में लिप्त !

बिस्वास को हुआ विश्वास,
है साहु की करतूत,
साहु का तो हाल बुरा था,
दिया पैन्ट में मूत !

समझ न आया पीछा-आगा,
पाद के साहु होस्टल भागा !
भांप के इनके गांड की गंध,
हुइ ISM की कैन्टीन बंद!
बंद है गूगल, बंद है याहू,
चहूं शोर है पादा साहु!

जै-जै साहु पाद-प्रचन्ड,
शीत लहर से लाते ठन्ढ !
निराशा से देते छुटकारा,
पादें आप हंसे जग सारा !

कहे फौलादी सुनो भई साहु,
प्राण-हन्ता है निकसित वायु !

1 comment:

Anonymous said...

mast hai bhai....ho sake to aur lambi karo...
AUR ek farmaayish...
paddode aur hagele ki jodi pe bhi kuch panktiyan ho jaayen to maza aa jaye.